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<title>जाट क्रॉनिकल &#45; : इतिहास</title>
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<description>जाट क्रॉनिकल &#45; : इतिहास</description>
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<dc:rights>© जाट क्रॉनिकल 2025  &#45; All Rights Reserved.</dc:rights>

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<title>जाटों की बालियान गौत्र/खाप का इतिहास</title>
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<description><![CDATA[ सिसौली या शिवपुरी- रघुवंशी वंश के जाटो की बालियान खाप का धावनी नगर से आकर या (भाट के ग्रन्थों के अनुसार) लाहौर (बल जनपद) से आकर सबसे पहले शिवपुरी (सिसौली) नामक यह गांव ही बसा था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 04 Jan 2024 21:02:22 +0530</pubDate>
<dc:creator>admin</dc:creator>
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<title>वीर तेजाजी की गाथा: जन्मोत्सव से युवराज बनने तक की प्रेरक कहानी</title>
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<description><![CDATA[ वीर तेजाजी की जन्मगाथा, तपस्विनी माताओं के त्याग, नागदेवता के वरदान और युवराज घोषित होने की प्रेरणादायक कथा पढ़ें। यह कहानी राजस्थान के गौरवशाली इतिहास की जीवंत झलक है। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 07 Mar 2023 02:05:31 +0530</pubDate>
<dc:creator>admin</dc:creator>
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<title>गाथा तेजाजी की: हळजोत्या और भाभी का भाता लाना</title>
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<description><![CDATA[ जय वीर तेजाजी की बंधुओं.......जैसा कि पूर्व विदित है, वीर तेजाजी महाराज के पूर्वज मध्य भारत के मालवा क्षेत्र से चलकर मारवाड. में स्थापित हुए थे।प्राचीन मध्य व उत्तर भारत में गुप्त व मौर्य जाटवंशो का गणतंत्रीय शासन हुआ करता था। (गुप्त जाटवंश से संबंधित थे जिसका इतिहास MP बोर्ड की पुस्तकों में वर्तमान वाकयदा जाट लिखकर पढाया जाता है। जबकि मौर्यवंश का अन्य जातियों ने अतिक्रमण कर लिया। कारण हमारा पढा लिखा ना होना तथा इतिहास की तरफ ध्यान न देना।)ये गणराज्य सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए काम करते थे, ना कि राजस्व वसूली जैसे घिनौने कृत्य। यह देश सोने की चिड़ीया तभी कहलाता था। बाकी 12 वीं शताब्दी के बाद के कुछ देशी राजाओं को छौड़कर शेष ने तो इतिहास और देश को कलंक ही लगाया था।गणराज्यों के काल में &#039;हळजोत्या&#039; को लेकर एक महत्त्वपूर्ण व्यवस्था मान्य थी। जेठ आषाढ में पहली वर्षा होने पर हलजोत्या का दस्तूर गणपति द्वारा किया जाने की परंपरा थी। उसके बाद ही प्रजा द्वारा शुरू की जाती थी। एक महत्वपूर्ण शुभ व्यवस्था उस जमाने में और थी कि गणपति और उनका परिवार खुद के हाथ से उपजाया अन्न ही खाते थे। प्रजा से गणराज्य के सहयोग के लिए ही कुछ लिया जाता था। जो कि पंचों की देखरेख में गणराज्य पर ही खर्च होता था। इस काम में लेसमात्र भी बेईमानी ना थी।(असली कलंक तो तुर्क आक्रमणों के पश्चात विलासिता में डूबे देशी भिखमंगे राजाओं ने लगाना शुरू किया जो भिखारियों की तरह किसानों का छीन के खाते थे तथा उनकी गाढी कमाई से बने महलों में रहते थे।)---=तेजाजी का हळजोत्या=उपरोक्त वर्णन हमने इस लिए आपके सामने रखा क्योंकि कुछ बंधुओं की यह शंका रहती है कि तेजाजी तो राजकुमार थे तो फिर उन्हें हळजोत्या करने कि कहां जरूरत पड़ी। क्योंकि अधिकांश गानों व कथाओं में तेजाजी के हळजोत्या से ही शुरुआत होती है। तेजाजी महाराज खरनाळ के युवराज थे इसलिए हळजोत्या की रस्म उन्हीं के द्वारा शुरू होती थी।तेजाजी कृषि विधियों के बहुत बड़े जानकार थे। अनाज को कतार में बोना, एक कतार से दूसरी कतार के बीच की दूरी, अनाज को बिखेर के नहीं बल्कि हल के साथ ही बीज को जमीन में दबाना, तथा एक बीघा में कितना अनाज बीजना जैसे विषयों के ज्ञाता थे। गौमूत्र तथा गौबर से खाद बना कृषि उपज बढाने जैसी तकनीकों को भी तेजाजी ने ईजाद किया था। तभी तो मारवाड़ में आज भी तेजाजी महाराज को &#039;कृषि के उपकारक अथवा कृषि वैज्ञानिक देवता&#039; की उपाधि से नवाजा जाता है।जब जैठ-आषाढ की पहली बारिश होती है तो राजमाता रामकुंवरी तेजल को कहती है कि-&#039;गाज्यो गाज्यो जैठ आषाढ़ कंवर तेजा रे।लगतो ही गाज्यो रे सावण भादवो।।हळियो लेर खेतां, सिधावो कंवर तेजा रे।थ्हारोड़ा बायोड़ा मोती नीपजे।।माता का वचन मानकर तेजल खेतों में जाने को तैयार होता है। बैलों को गाडे से जोतकर रास-पिराणी, हळ-हाळड़ी और अनाज साथ लेते हैं। माता तेजल को समझाती हुई कहती है कि - &#039;खेती में समय का बड़ा महत्त्व होता है। घड़ी पुल का बिज्या मोती निपजाता है। समय चुकने पर फसल नहीं होती। भौजाई तेरा भाता लेकर दोपहर में आ जायेगी और लाडो राजल बैलों का चारा लेकर आ जायेगी। अब ईष्टदेव को प्रणाम कर खेतों में सिधावो।&quot;&#039;डेहरियां में मूंग ज्वार कंवर तेजा रे।बाजरियो बीजो थे खाबड़ खेत में।।&#039;(यह खाबड़ खेत आज भी खरनाळ में मौजूज है। और तेजाजी महाराज की अमर गाथा का यशोगान कर रहा है।)हळ बैल लेकर तेजाजी खेतों में पहुंचते हैं। सर्वप्रथम धरती माता को माथा टेककर प्रणाम करते हैं तथा कार्यसिद्धि हेतू स्यावड़ माता को प्रणाम करते हैं। तेजाजी अपने हल बैलों को खेत के दक्षिण पश्चिम कोण पर ले जाकर उत्तर की तरफ मुंह करके बीजाई का श्रीगणेश करते हैं।लोककथाओं में बारह कोस की आवड़ी का उल्लेख आता है। कहते हैं कि गेण तालाब से खरनाळ तक का इलाका गणपति ताहड़ जी के अधिकार में था।प्रभात में तेजाजी ने ऊमरा निकालना शुरू किया। दोपहर तक पूरी आवड़ी बीज डाली। नागौरी नस्ल के चुस्त बैल तो दूसरी तरफ बलिष्ठ भुजाओं के मालिक तेजाजी महाराज।&#039;कोरां मेरां खेत निवार्&#039;यो कंवर तेजा रे।बारह बीघां री बीजी आवड़ी।।दिन का दूसरा पहर शुरू होने को आया था मगर भाभी अभी तक भाता लेकर नहीं पहुंची थी। तेजाजी व बैल दोनों भूख से व्याकुल हो उठे। तेजाजी ने बैलों को खोलकर मुक्त कर दिया और खुद खेजड़ी के नीचे आराम करने लगा। और मन ही मन गुस्सा करने लगा।=भाभी का भाता लाना=काफी देर होने के पश्चात भाभी खाना लेकर आयी। तेजाजी भाभी को उलाहना देता हुआ कहता है कि यह भी कोई भात लेकर आने का समय है? भूख से मेरी और बैलों की क्या गति हो गई? आपको कुछ समझ में आता है या नहीं?&#039;बेल्या भूखा रात का, बीना कलेवे तेज।भाभी थां सूं विनती, कठै लगाई जेज।।&#039;तेजल राजकुमार की बातों ने भावज को व्यथित कर दिया। तेजाजी का संयुक्त परिवार था। और बहुत ज्यादा पशुधन भी। इतने बड़े परिवार के लिए अनाज पीसना और खाना बनाना, पशुधन के लिया दळिया दळना और बंटा बनाना जैसे काम करने में समय लग जाता था। तेजाजी के पांच भाभीयां थी। सभी समझदार, शांत प्रवृति की और मेहनती थी। मगर घर का काम इतना अधिक होता था कि सब बांटकर करे तो भी काम खत्म नहीं होता। इसी कारण भाभी को देर हो गई। भूख से व्याकुल तेजल इतना सोच नहीं सका और भावज पे गुस्सा हो गया। भाभी देवर के बोलों से विचलित हो गई। और बोली कि - &#039;ज्यादा ही भूख लगती है तो ले आ सात फैरों की परणी नारी को। वह अपने बाप के घर बैठी तेरी बाट देख रही है।&#039;&quot;मण पिस्यो मण पोयो कंवर तेजा रे।मण को तो रांधियो खाटो खीचड़ो।।लीलण बैल्यां खातर, दळियो ढाणो तेजा रे।गौबर तो उठायो सारी गौर को।।दौड़ी आई लार की लार कंवर तेजा रे।गीगा न छौड्याई हीण्डे रोवतो।।ऐड़ो कांई भूख भूख्याळो कंवर तेजा रे।परणी न ले आवो बैठी बाप के।।भाभी की बातें सुनकर तेजाजी महाराज सोच में डूब गये। उन्हें यह तो मालूम था कि उनका विवाह हो चुका है। मगर कहां हुआ? किसके साथ हुआ? तथा विवाह के समय जो घटना हुई उससे बिलकुल अनजान थे।भाभी की  ]]></description>
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<pubDate>Tue, 11 Apr 2017 02:05:37 +0530</pubDate>
<dc:creator>admin</dc:creator>
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<title>जानें जट्ट की लिपि के बारे में</title>
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<description><![CDATA[ आपको जट्टकी लिपि से रूबरू कराते है ।संसार में एक ग्लोबल कल्चरल ट्राइब हुई है जिसका वखान विश्व की सभी हिस्टोरियन्स लॉबी ने किया है जो प्रूव्ड है ।इतिहास के पितामह हेरोडोट्स ने जट्ट के कल्चर को तथ्यों से जोड़ा है ।प्राकृत भाषा जिस से पाली ,पंजाबी,ठेठ खड़ी ,बृज,अवधी,आदि अनेको भाषाएं विकसित हुई प्राकृत भाषा का मूल स्रोत जाटकी लिपि थी ।ग्रिम्ज लॉ ऑफ़ वेरिएशन के मुताबिक भाषा विज्ञान में सबसे जट्टकी लिपि प्राकृत भाषा ही आदिकालीन है ।जट्टकी लिपि धार्मिक ठेकेदारों की संस्कृत और फ़ारसी से प्राचीन है इसी जो तोड़ फोड़ कर यह भाषाएं विकसित की गयी है । ]]></description>
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<pubDate>Mon, 10 Apr 2017 02:05:49 +0530</pubDate>
<dc:creator>admin</dc:creator>
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<title>बाबा भय सिंह &#45; इतिहास के पन्नों में खोये हुए योद्धा</title>
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<description><![CDATA[ कुछ महापुरुष ऐसे होते है जिनका नाम इतिहास के पन्नो में खो जाता है जाट युद्ध प्रिय रहा है पर कमी ये रही है कि जाट कलम का कमजोर रहा है ऐसे महापुरषो का इतिहास भुला दिया गया जो स्वर्णिम अक्षरो में लिखना चाहिए थाआज बात करते है बाबा भय सिंह की, बाबा भय सिंह का नाम भोर सिंह था जिनका जन्म डीगल गांव जिला झज्जर (हरियाणा) में हुआ था जिनके नाम पर गांव भैंसी (मुज़फ्फरनगर ) का नाम पड़ा शुरू शुरू में इस गांव को भय सिंह की ढाणी कहते थे जो बाद में अंग्रेजो ने बिगाड़ कर भैंसी कर दिया कुछ लोग बाबा भय सिंह को लुटेरा कहते है जिनका ख़ौफ़ बहुत था परंतु बाबा भय सिंह गरीबो के रोबिन हुड थे जो बड़े बड़े व्यापारियों को लूट कर गरीबो में बाटते थे बाबा भय सिंह ने आस पास के गावो के जाटो के साथ मिलकर 1761 में अहमदशाह के काफिले को लूट लिया था फिर बाबा भय सिंह आस पास के जाटो को लेकर यमुना पार करके कई समूह में गांव बसाये जिसमे अहलावत गोत्र के साथ दलाल गोत्री जाट और अन्य गोत्र भी थे कुछ अहलावत जाट कंडेरा - तोमर गोत्र के गांव में रुके (बागपत ) में रुके, कुछ ने दौराला (मेरठ) गांव बसाया कुछ गंगा पर करके बिजनोर गए वहाँ कई गांव बसाये | बाबा भय सिंह अपने परिवार वालो और परिचितों के साथ अनूपशहर (आधुनिक भैंसी- मुज़फ्फरनगर ) में बसे ये बहुत प्राचीन और बड़ा गांव था जिसमे बनिए, जुलाहे और पठान मुख्य जाति थी धीरे धीरे बाबा भय सिंह और उनके परिचितों के डर से व्यापारी और अन्य जातिया गांव से पलायन कर गयी आज इस गांव में एक बनिए और एक पठान का घर रह गया है यह इतना प्राचीन गांव है कि आज भी इस गांव में जब भी नींव डालते है पक्की कुईया (बने बनाये ), नर कंकाल और चुडिया आदि चीज़े मिलती है आज यह गांव जाटो के बड़े गाँवो में आता है आज इस गांव में 60% से ज्यादा आबादी जाटो की है इस गांव के लोग खुद को डिगलिया बोलते है अहलावत गोत्र के जाटो की संख्या 6200 के करीब है 400 के करीब दलाल गोत्री जाट भी रहते है जिनमे बाबा भय सिंह की बहन की शादी हुई थी जिन्हें बाबा ने अपनी साथ ही बसाया था बाबा की वीरता के कई किस्से है जोकि हम कलम में कमजोर होने के कारण बाबा को भूल गए वरना जिनकी बदोलत जाटो के 20 से ज्यादा गाँवो की स्थापना हुई जो अपने आप में बड़ी बात है उन्हें आज हम भूल गएजिन महापुरुषो की बदौलत हमारा अस्तित्व है उन्हें हमे नही भूलना चाहिए आगे हम ऐसे ही जाट महापुरुषो का वर्णन करेंगे जिन्होंने जाटो का भूगोल और इतिहास ही पलट दिया और वो खुद इतिहास के पन्नो में खो गए है।www.jaatdarshan.inज़्यादा से ज़्यादा शेयर करे     ]]></description>
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<pubDate>Fri, 04 Nov 2016 02:06:04 +0530</pubDate>
<dc:creator>admin</dc:creator>
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<title>जानें वीर तेजाजी महाराज की जन्मस्थली खरनाल के बारे में</title>
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<description><![CDATA[ जय वीर तेजाजी की बंधुओं..वीर तेजाजी धाम खरनाल....वीर तेजाजी महाराज की जन्मस्थली गांव खरनाल है। इसे खुरनाल व खड़नाल भी कहा जाता है। यह गांव नागौर से दक्षिण-पश्चिम दिशा में 16 किमी दूर जौधपुर रोड़ पर बसा है। नागौर जिले का यह गांव देशभर के किसानों का काशी-मथुरा, मक्का-मदीना है। खरनाल की भूमि में कृषि गौ अमृत न्याय व मानवता की इबारतें सत्यवादी वीर व तपधारी जति तेजा द्वारा लिखी गई।खरनाल गांव के मध्य में वीर तेजाजी महाराज का तीमंजिला भव्य मंदिर बना हुआ है। जिसका जिर्णोद्धार वि.सं. 1943 (1886) को हुआ था। मंदिर पर लिखे शिलालेख पर जिर्णोद्धार कराने वालों की सूचि के अलावा एक दोहा भी लिखा है-&quot;खिजमत हतौ खिजमत, शजमत दिन चार।चाहै जन्म बिगार दै, चाहै जन्म सुधार।।&quot;खरनाल के पूर्व में 1 किमी की दूरी पर तालाब की पाल पर बहन राजल बाई का &#039;बूंगरी माता&#039; के नाम सेमंदिर बना हुआ है। जो कि भातृ प्रेम का उत्कृष्ट उदाहरण है।खरनाल कभी एक गणराज्य हुआ करता था। जिसके भू-पति वीर तेजाजी के वंशज हुआ करते थे। वे एक गढी मेंरहा करते थे। खरनाल तेजाजी मंदिर के बगल में उस गढी के भगानावशेष आज भी देखे जा सकते हैं। वर्तमान में खरनाल ग्राम पंचायत के रूप में विधमान है। यहां लगभग 600 घर है। इस गांव में धौलिया गौत्री जाटों के लगभग 200 घर है। धौलियों के अलावा यहां लगभग 7-8 जाट गौत्रों का निवास है। #खुशी_की_बात_की_वीर_तेजाजी_महाराज_को_अपनी_जाति_का_बता_दुष्प्रचारित_करने_वाले_राजपूतों_का_इस_गांव_में_एक_भी_घर_नहीं_है।जाटों के अलावा यहां समस्त किसान जातियों व दलित जातियों का निवास है। जो एकमत तेजाजी को अपना ईष्टदेव मानते हैं।यहां की वर्तमान सरपंच चिमराणी निवासी मनीषा ईनाणियां है।धोलिया जाटों के भाट भैरूराम डेगाना के अनुसार वीर तेजाजी महाराज के षडदादा श्री उदयराज जी ने खौजा-खौखरों से खुरनाल/करनाल को जीतकर वर्तमान खरनाल बसाया था। खरनाल 24 गांवो का गणराज्य था। जिसके भूपति/गणपती उदयराज से लेकर ताहड़जी धौलिया तक हुए।खरनाल के दक्षिण में धुवा तालाब है। जो कि धवलराय जी धौलिया (द्वितीय) द्वारा खुदवाया गया। यह तालाब वर्ष भर गांव की प्यास बुझाता है। तालाब की उत्तरी पाल पर एक भव्य छतरी बनाई हुई है जो किकोई समाधी जैसी प्रतीत होती है। इस पर वि.सं. 1022 व 1111 लिखा हुआ है। यह &#039;बड़कों की छतरी&#039; कहलाती है। इसी तालाब के एक छौर पर तेजल सखी लीलण का भव्य समाधी मंदिर बना हुआ है। वहीं दूसरी तरफ नवनिर्मित गजानंद जी (2009) व महादेव जी (2000) के मंदिर है। इसके अलावा बेहद प्राचीन ठाकुर जी का मंदिर बना हुआ है। खरनाल के कांकड़ में खुदे समस्त तालाबों के नाम वीरतेजाजी महाराज के पूर्वजों पर ही है।खरनाल गांव के बाहर की तरफ जौधपुर हाईवे पर लगभग 7-8 बीघा में मैला मैदान स्थित है। इसी मैदानमें सड़क से 50 मीटर की दूरी पर &quot;सत्यवादी वीर तेजाजी महाराज&quot; की 6-7 टन वजनी भव्य व विशाललीलण असवारी प्रतीमा लगी हुई है।जिसका निर्माण स्व.रतनाराम जी धौलिया की चिरस्मृती में उनकी धर्मपत्नी कंवरीदेवी व सुपुत्रों द्वारा 2001 में करवाया गया।मैला मैदान में एक मंच बना हुआ है जहां पर तेजादशमी को विशाल धर्मसभा होती है।जिसमें देशभर के लाखों किसान जुटते हैं।अभी वर्तमान में &quot;अखिल भारतीय वीर तेजाजी महाराज जन्मस्थली संस्थान, खरनाल&#039; द्वारा 2-3 बीघा जमीन और खरीदी गई है। जहां वीर तेजाजी महाराज का भव्य व आलिशान मंदिर बनाया जाना प्रस्तावित है।&quot;अखिल भारतीय वीर तेजाजी महाराज जन्मस्थली संस्थान, खरनाल&#039; के चुनाव हाल ही में सम्पन्न हुए हैं।इसके वर्तमान अध्यक्ष &#039;श्री सुखाराम जी खुड़खुड़िया&#039; है तथा पूर्व अध्यक्ष &#039;श्री अर्जुनराम जी महरिया&#039; थे।वीर तेजाजी महाराज मुख्य मंदिर के सेवक &quot;श्री मनोहर दास जी महाराज&quot; है।                                                                         वीर तेजाजी मंदिर, खरनालके गादिपती पर वर्तमीन में श्री दरियाव जी धौलिया आसीन है। जिनमें तेजाजी का भाव आता है। इनके अलावा औमप्रकाश जी धौलिया भी तेजाजी महाराज के &#039;घुड़ला&#039; है। मंदिर के गर्भ गृह में वीर तेजाजी महाराज, लीलण सखी व गौमाता के बेहद सुंदर स्वर्ण लेपित धातुमूर्तियां विराजमान है। जिनकी सुबह शाम पूजा अर्चना होती है। वैसे तो वर्षपर्यंत तेजाभक्त दर्शनार्थ खरनाल आते है मगर सावण भादवा माह में खरनाल धाम तेजाभक्तों से अटा रहता है। यहां तिल रखने की भी जगह नही मिलती। गांव गांव सेडीजे पर नृत्य करते वीर तेजाजी महाराज के संघ मेले में चार चांद लगा देते है। बरसात की रिमझिम में तेजाभक्तों के जयकारे एक अलग ही माहौल बना देते है। भादवा शुक्ल नवमी की रात &#039;माता सती पेमल&#039;को समर्पित होती है। उनके आशीष व अंतिम वाणी के आदेशानुसार नवमी की रात जगाई जाती है। अर्थात् नवमी को रातभर तेजाभक्त रात्री जागरण करते है। खरनाल गांव में रात्री जागरण का कार्यक्रम बेहद भव्य होता है। पहले वीर तेजल महाराज की पूजा अर्चना तत्पश्चात तेजा मंदिर दालान में विभिन्न गांवो से पधारे &#039;तेजागायकों&#039; द्वारा रातभर टेरैं दी जाती है। झिरमीर बरसात के तेजागायन का लुत्फ उठाना एक अलग ही आनंद से सराबोर कर देता है।भादवा सुदी दशम को मुख्य मेले का आयोजन होता है। जिसमें देश प्रदेश से तेजाभक्त दर्शनार्थ उपस्थित होते है। दर्शनौं का यह क्रम रात तक चलता रहता है। शाम को मेला मैदान में धर्मसभा का आयोजन किया जाता है जिसमें सर्वसमाज के गणामान्य व्यक्ति अपना उद्धबोधन देते है।वीर तेजा दशमी को पूरे नागौर जिले के सरकारी प्रतिष्ठानों में जिला कलक्टर महोदय द्वारा राजकीय अवकाश घोषित किया जाता है।आप सभी तेजाभक्तों से निवेदन की इस बार तेजादशमी को खरनाल गांव के समस्त दर्शनीय स्थलों पर जरूरशीश नवाजे। इस गांव के कण कण में देवात्मा वीर तेजाजी महाराज का सत व अमर आशीषें मौजूद है।आप सभी तेजाभक्तों का मैं 11 व 12 सितंबर को खरनाल धाम पधारने का मधुर निमंत्रण देता हूं।खरनाल गांव से मेरे बड़े भाई &quot;रणजीत जी धौलिया&quot; (युवा कांग्रेस नेता, पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष न ]]></description>
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<pubDate>Mon, 29 Aug 2016 02:06:15 +0530</pubDate>
<dc:creator>admin</dc:creator>
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